इस दौर का चलन

न अपना वक़्त आया, न मौक़ा मिला निभाने का,
इस दौर के रिश्तों को, निभाना सीख नहीं पाए।
जल गए हाथ, और दामन भी राख हुआ,
पर ये ज्योति बुझाना, हम सीख नहीं पाए।।
नए घर बने तो मगर, दूरियाँ इस कदर बढ़ गईं,
इस शहर को अपना, हम बना ही नहीं पाए।
वो पूछते रहे कि, आँखें क्यों नम हैं मेरी,
हम भरे गले से, झूठा बहाना बना नहीं पाए।।
हर बार जाते हुए, मुड़कर देखा उसको हर दफा
छोड़कर जाना किसी को, हम सीख नहीं पाए।।
दुनिया के चलन में नासमझ ही रह गए,
मान लिया हमने, कि जीना सीख नहीं पाए 
इस दौर के रिश्तों को, निभाना सीख नहीं पाए।

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