बेनाम रिश्ता

रात के दो बज चुके थे। कमरे में सिर्फ एक हलकी पीली रोशनी जल रही थी। रजत अपनी बालकनी के पास खड़ा था, और उसकी नज़रें सोफे पर एक किताब सीने से लगाए सो रही मानसी पर टिकी थीं, जो उसकी दोस्त थी, हमसफर थी, और शायद उससे भी बहुत कुछ ज़्यादा।रजत के मन में अचानक एक खयाल गूंजा कि मानसी ने कभी उससे रिश्ते का कोई नाम नहीं माँगा था। उसने कभी भविष्य को लेकर कोई दबाव नहीं बनाया। उसने बस अपना समय, अपनी भावनाएं, अपनी परवाह, सब कुछ रजत पर लुटा दिया था... बिना कभी कोई हिसाब रखे। एक बार रजत ने पूछा, "तुम मेरे लिए इतना क्यों करती हो?" मानसी ने बस मुस्कुरा कर कहा, "क्योंकि तुम 'तुम' हो, और मुझे तुम्हारे अलावा कुछ नहीं चाहिए।" वह कभी नहीं कहती थी कि "मैंने तुम्हारे लिए यह किया, तो तुम भी ऐसा करो।" उसका प्यार किसी लेन-देन का मोहताज नहीं था।
रजत को अपना पिछला साल याद आ गया। वह दौर जब उसका करियर बिल्कुल ढलान पर था। वह चिड़चिड़ा हो गया था, खुद से भरोसा खत्म हो रहा था। दुनिया और रिश्तेदारों की नज़रों में वह एक असफल इंसान था। लेकिन मानसी का प्यार किसी समाज के ठप्पे या शादी के सर्टिफिकेट पर नहीं लिखा था; वह तो उसकी हर एक परवाह में झलकता था।जब रजत खुद से अपने हालात से लड़ रहा था तब मानसी ने उसे संभाला था। उसके बुरे,अँधेरे दिनों में।
रजत जानता था कि मानसी की अपनी ज़िंदगी भी आसान नहीं थी। ऑफिस की राजनीति और घर की ज़िम्मेदारियों के बीच वह कई बार अंदर से पूरी तरह टूट जाती थी। कई बार उसने मानसी  को रोते हुए महसूस किया था। लेकिन सामने आती, तो उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान होती। वह रजत के पास बैठती, उसका हाथ थामती और ऐसे उसके साथ खड़ी रहती जैसे दुनिया में कुछ भी गलत हुआ ही न हो। वह अपना दर्द छुपा लेती थी ताकि रजत कमज़ोर न पड़े।
"आखिर क्यों?" रजत ने खुद से पूछा।जवाब बहुत सीधा था, जो अक्सर लोगों को समझ नहीं आता। और सच तो यह था.. वह रजत से इसलिए प्यार नहीं करती थी कि उसे उससे कुछ मिलता था। रजत के पास उसे देने के लिए न तो बैंक बैलेंस था, न कोई रुतबा और न ही समय। वह उससे प्यार करती थी... बस प्यार। तमाम कमियों और खामियों के साथ।
रजत धीरे से चलकर मानसी के पास गया। उसने उसके माथे से बालों की लट हटाई और उसे एक चादर ओढ़ा दी। मानसी ने नींद में ही रजत का हाथ कसकर पकड़ लिया, जैसे वह नींद में भी उसे खोना नहीं चाहती हो।
उस पल रजत की आँखों से एक आँसू छलक कर मानसी के हाथ पर गिर गया। उसे ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच समझ आ गया था— कि वह इस दुनिया में कहीं भी चला जाए, आसमान की कोई भी ऊंचाई छू ले... उसे ज़िंदगी में कभी, किसी से भी, ऐसा प्यार नहीं मिलेगा... जो इस बिना नाम के रिश्ते और मानसी के प्यार से ज़्यादा गहरा हो।

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