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Showing posts from November, 2025

Nahi pata...

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क्या गलत है क्या सही, क्या मेरी खता  तू है मेरे दिल में बसा, यही बस है पता। क्या सोचूं किसको सोचूं, मेरा रहा है क्या  और क्या अब मैं कहूं, नहीं कुछ पता।। किस राह से आयेगा वो, बेचैन है निगाह  दिल की धडकन को छुएगा! नहीं कुछ पता। तेरी हो गई, ए ज़माने अब ना मुझे सता  जो सोचे वो क्या सोचे, मुझे नहीं पता।। माना कि हवाएं, किनारों से रही है सता  लौ है बाक़ी ज्योति में, मुझे है ये अता  और क्या अब मैं कहूं, नहीं कुछ पता।।

इस दौर का चलन

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न अपना वक़्त आया, न मौक़ा मिला निभाने का, इस दौर के रिश्तों को, निभाना सीख नहीं पाए। जल गए हाथ, और दामन भी राख हुआ, पर ये ज्योति बुझाना, हम सीख नहीं पाए।। नए घर बने तो मगर, दूरियाँ इस कदर बढ़ गईं, इस शहर को अपना, हम बना ही नहीं पाए। वो पूछते रहे कि, आँखें क्यों नम हैं मेरी, हम भरे गले से, झूठा बहाना बना नहीं पाए।। हर बार जाते हुए, मुड़कर देखा उसको हर दफा छोड़कर जाना किसी को, हम सीख नहीं पाए।। दुनिया के चलन में नासमझ ही रह गए, मान लिया हमने, कि जीना सीख नहीं पाए  इस दौर के रिश्तों को, निभाना सीख नहीं पाए।