मैं मिलूंगी वहीं.....

इक दिन 
जब कभी मैं गुम हो जाऊं
ढ़ूंढने तो मुझे तुम आओगे न फिर?

ठिकानें तो मेरे सारे पता हैं तुम्हे
नदी के किनारे पर,
उन बर्फीले पहाड़ों के पास,
गहरे जंगलों में ,जहां चांदनी रातों में 
हम बातें किया करते थे
घंटों बिना कुछ कहे सितारों की तरह।

कैसे भी कहीं भी बस निकल जाना
धुंध की महीन सी चादर ओढ़ लेना
देर तक आसमां को करीब से देखना
उसका नीलापन दिल में समेट लेना।। 

लुकाछिपी में मैं अक्सर नदी बन जाया करूंगी 
तुम समंदर बन कहीं दूर छुप जाना
न जाने कितनी गुफाओं को पार कर
तुम्हे ढूढ़ती दूर निकल जाया करूंगी
तुम खामोशी से मुझे देखा करना
मैं कह रही हूं, खूब सताया करना
तुम्हे पता तो है ना कि मैं तुम तक ही पहुंचूंगी।।

तो खो जाऊँ न किसी दिन, जी लेना उन पलों को 
मन से जी दिल के तार जुड़े हैं तो
गौर से सुनना धड़कनों को अपनी
वहीं....बस वहीं मिलूंगी मैं!

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